Hartalika Teej 2026 – हरतालिका तीज सुहाग का प्रतीक प्रमुख व्रत है, जिसे विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। हरितालिका दो शब्दों से बना है, हरित और तालिका। हरित का अर्थ है हरण करना और तालिका अर्थात सखी। हर वर्ष यह पर्व भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। जिस कारण इसे तीज कहते है।
हरतालिका तीज 2026 कब है?
13 सितंबर 2026 (रविवार) को मनाया जाएगा
यह पर्व हर साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है, इसलिए इसे “तीज” कहा जाता है।
व्रत कथा (Vrat Katha)
पुराणों में बताया गया है कि हरतालिका तीज का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने रखा था।
पिता के यज्ञ में अपने पति का अपमान देवी सती सह न सकीं। उन्होंने खुद को यज्ञ की अग्नि में भस्म कर दिया। अगले जन्म में उन्होंने राजा हिमाचल के यहां जन्म लिया और पूर्व जन्म की स्मृति शेष रहने के कारण इस जन्म में भी उन्होंने भगवान शंकर को ही पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की। देवी पार्वती ने तो मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान लिया था और वह सदैव भगवान शिव की तपस्या में लीन रहतीं। पुत्री की यह हालत देखकर राजा हिमाचल को चिंता होने लगी। इस संबंध में उन्होंने नारदजी से चर्चा की तो उनके कहने पर उन्होंने अपनी पुत्री उमा का विवाह भगवान विष्णु से कराने का निश्चय किया।
पार्वती जी को जब यह पता लगा कि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते हैं तो उनके मन को बहुत ठेस पहुंची। उन्होंने अपनी सखियों से कहा कि वह शिवजी के अलावा किसी और से कतई विवाह नहीं करेंगी। पार्वतीजी के मन की बात जानकर उनकी सखियां उन्हें लेकर घने जंगल में चली गईं। इस तरह सखियों द्वारा उनका हरण कर लेने की वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा। पार्वतीजी तब तक शिवजी की तपस्या करती रहीं जब तक उन्हें भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त नहीं हुए।
इस दिन लगभग हर सुहागन महिलाएं शंकर-पार्वती की बालू या मिट्टी की मूर्ती बनाकर पूजन करती है। घर को स्वच्छ करके तोरण-मंडप आदि सजाया जाता है। एक पवित्र चौकी पर शुद्ध मिट्टी में में गंगाजल मिलाकर शिलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती व उनकी सखी की आकृति बनाई जाती है। तत्पश्चात देवताओं का आवाहन कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इस व्रत का पूजन पूरी रात्रि चलता है। प्रत्येक पहर में भगवान शंकर की पूजन-आरती होती है।
हरतालिका तीज का महत्व
- यह व्रत अखंड सौभाग्य का प्रतीक है
- कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती हैं
- सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं
- भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है
व्रत के नियम
- यह व्रत निर्जला रखा जाता है (जल भी ग्रहण नहीं किया जाता)
- व्रत पूरे दिन और रात रखा जाता है
- अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोला जाता है
- यह व्रत कुंवारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं दोनों रख सकती हैं
- एक बार शुरू करने के बाद इसे नियमित रूप से करना चाहिए
- रात में जागरण करना शुभ माना जाता है
- स्वास्थ्य समस्या होने पर फलाहार के साथ व्रत किया जा सकता है
पूजा सामग्री
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री इस प्रकार है:
- गीली मिट्टी या बालू
- बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, आंकड़े का फूल
- केले का पत्ता, विभिन्न फल-फूल
- सुहाग सामग्री: मेंहदी, चूड़ी, सिंदूर, बिंदी, काजल, कंघी आदि
- श्रीफल, कलश, चंदन, कपूर, घी, दीपक
- दही, दूध, शहद, चीनी (पंचामृत हेतु)
- गंगाजल
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पूजा विधि
- हरतालिका तीज के दिन सुहागिन महिलाएं सुबह स्नान के बाद नए वस्त्र पहनकर इस व्रत का संकल्प लेकर दिन की शुरुआत कर सकती हैं।
- इसके बाद महिलाएं हाथों में मेंहदी लगाकर, संपूर्ण सोलह श्रृंगार करें।
- हरतालिका तीज में श्रीगणेश, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। इसलिए अब मिट्टी से तीनों की प्रतिमा बनाएं।
- अब भगवान गणेश को तिलक करके दूर्वा अर्पित करें।
- इसके बाद भगवान शिव को फूल, बेलपत्र और शमीपत्र अर्पित करें और माता पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें।
- इसके अलावा आपको तीनों देवी-देवताओं को वस्त्र अर्पित करना है।
- इसके बाद हरितालिका तीज व्रत की कथा सुनें या पढ़ें।
- भगवान गणेशी जी की आरती करें।
- अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती उतारने के बाद भोग लगाएं।
व्रत के नियम
हरतालिका तीज का व्रत निर्जला किया जाता है। यानी पूरा दिन, पूरी रात और अगले दिन सूर्योदय के पश्चात अन्न और जल ग्रहण किया जाता है।-यह व्रत कुंवारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं रखती हैं।-इस व्रत को एक बार प्रारंभ करने के पश्चात छोड़ा नहीं जाता।-यदि कोई महिला खराब स्वास्थ्य के चलते यह व्रत नहीं रख पा रही है तो एक बार उद्यापन करने के पश्चात फलाहार के साथ यह व्रत रह सकती है।-हरतालिका व्रत में रात में सोया नहीं जाता है बल्कि पूरी रात प्रभु का भजन कीर्तन करना शुभ माना जाता है।
यह पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को भी दर्शाता है।