झारखण्ड की माटी उलिहातू (Ulihatu) में जन्मा एक बालक जो आगे चलकर बिरसा मुंडा बना। जिसे आज दुनिया आदिवासियों का मसीहा बुलाती है। बिरसा मुंडा (Birsa Munda) एक ऐसे क्रांतिकारी थे, जिसे कुछ लोग भगवान मानते हैं तो कुछ क्रांति का अग्रदूत। बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी बिरसा मुंडा को सम्मान से “धरती आबा” (‘Dharti Abba’) बुलाते हैं
बिरसा मुंडा को यूँ हीं आदिवासी भगवान नहीं मानते हैं बिरसा मुंडा (‘Father of the Earth’ Birsa Munda) ने शोषण के विरुद्ध बगावत और आदिवासी अस्मिता के संरक्षण के लिए जो आवाज़ उठाई थी। समय समय पर वो आवाज़ हमें आज भी सुनाई पड़ती है। भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक के तौर पर याद किया जाता है , जिन्होंने भारत के आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर कर उन्हें पहचान दिलाई। बिरसा (Birsa Munda) मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में दुनिया छोड़कर चले गए लेकिन आदिवासी समाज के लिए किये गए उनके संघर्ष को सदियाँ याद रखेगी।
धरती आबा बिरसा मुंडा (Birsa Munda) की वो कहानी, जो आपने आज तक नहीं पढ़ी…
वो तपते जून की गरमी थी. जेल में बंद 25 साल का वो नौजवान बेतहाशा पड़ा था। मगर जेल की कोठरी के बाहर तो लाखों लोग उसे किसी नायक की तरह याद कर रहे थे । उसके लौटने का इंतज़ार कर रहे थे। कितनी अजीब बात थी कि उस नौजवान का शरीर भी कैद था और उसके हैरतअंगेज कारनामे भी कैद ही थे। लेकिन एक फर्क था। वो ये कि शरीर कैद था अंग्रेजों की जेल में और कारनामे कैद थे उन लाखों लोगों की यादों में जिन्होंने उस नौजवान को अपना धरती आबा (Birsa Munda — freedom fighter ‘Dharti Abba’) मान लिया था। ये नौजवान था बिरसा मुंडा (Birsa Munda) ।
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खूंटी के एक छोटे से गांव उलिहातु (Ulihatu) में 15 नवंबर 1875 को सुगना मुंडा (Sugna Munda) के घर जन्मे थे बिरसा मुण्डा (Birsa Munda) । उस वक्त गांवों में ना सड़कें होती थी ना बिजली। वैसे कहने को आज भले ही सड़कें और बिजली गांवों में पहुंच तो गईं हैं लेकिन हकीकत क्या है – कैसी है, ये छुपा तो नहीं है।
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…तो बिरसा मुंडा (Birsa Munda) के वक्त ना सडकें थीं ना बिजली। अंग्रेजों के नये नियम कानूनों ने आदिवासियों को हर तरह से परेशान कर दिया। जमीनें छीनी गईं। जंगल छिन गए। फिर बचा ही क्या था ! पेशा बदलने पर मजबूर हो गये थे। तरह तरह के कर (टैक्स) लाद दिए गए थे। मुंडा जनजाति की अपनी प्रशासनिक व्यवस्था तो तहस नहस हो ही चुकी थी।
मगर जीना तो जरूरी है और जीने के लिए कई आदिवासी अपने परिवार को लेकर इधर उधर भटकने लगे। कोई दूर चाय बागान में मजदूरी करने चला गया। चाय बागान भी कोई स्वर्ग नहीं थे। वहां अलग ही कहानी बन रही थी। उसकी बात फिर कभी।
…तो इन आदिवासियों में से कोई शहर आ गया। तो कोई दूसरे गांव जाकर बड़े किसानों के यहां जैसे तैसे काम करने लगा। बिरसा का परिवार भी इधर उधर भटका । इस भागदौड़ के दौरान बिरसा को मामा के घर रख दिया गया। वहीं रहने लगे। वहीं से पढ़ाई चलने लगी। यहां जयपाल नाग नाम के व्यक्ति एक छोटी सी पाठशाला चलाया करते थे। वहीं उसी पाठशाला में बिरसा पढ़ने लगे।
कहते हैं चिंता से चतुराई घटे दुख से घटे शरीर। लेकिन गरीबी – मुफलिसी और बचपन में ही बेघर होने और भूखे भटकने से पैदा होने वाली चिंता बिरसा की प्रतिभा घटा नहीं पाई। इसके उलट, इन चीजों ने बिरसा के मन पर गहरा असर डाला । वो तप रहे थे। निखर रहे थे। पाठशाला चलाने वाले जयपाल नाग बिरसा की प्रतिभा से इतने खुश हुए कि उन्होंने बिरसा की बेहतर पढ़ाई के लिए उन्हें पास के ही जर्मन मिशनरी स्कूल में दाखिल करवा दिया।
मिशनरी के संपर्क में आने के बाद दर दर भटक रहे बिरसा और उनके परिवार को थोड़ी सी राहत मिली। स्थिति कुछ बेहतर हुई। भूख और बेघरी की त्रासदी झेल चुके और बेहतरी की आस भी छुट जाने के बाद जीवन में आयी थोड़ी बेहतरी से प्रभावित होकर बिरसा और उनका परिवार ईसाई हो गया।
इधर वक्त भी बीत रहा था। बिरसा भी बड़े हो चुके थे। प्रतिभावान थे तो आसपास घट रही घटनाओं को देखने समझने की गहन रुचि भी रखते थे। उन्होंने देखा कि बचपन में जिस गरीबी और पलायन दर पलायन से वो खुद मजबूर हुए थे उससे आज भी कई दूसरे लोग मजबूर होकर जी रहे हैं। ब्रिटिश सरकार मुंडा , उरांव, खरवार सहित कई आदिवासी जनजातियों की अपनी बनायी सदियों पुरानी स्थानीय प्रशासनिक और राजस्व – कर व्यवस्था को तबाह कर चुके थे। इसके बदले अपने नये कानून, नयी प्रशासनिक व्यवस्था और कर – राजस्व व्यवस्था ला चुके थे। जाहिर है कि ये बदलाव आदिवासियों की भलाई के लिए तो नहीं ही थे बल्कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की भलाई के लिए थे।
तो जैसा होना था वही हुआ। आदिवासियों का भला ना होना था ना हुआ। बल्कि अंग्रेजों के बनाए कानूनों से ताकतवर हुए स्थानीय जमींदारों की वजह से गरीब और बेघर ही हुए। अपनी ही जमीन और जंगल से बेदखल कर दिए गए।
बिरसा ने देखा कि भले ही मिशनरी के संपर्क में आने से उनकी खुद की ज़िंदगी पहले से थोड़ी बेहतर हुई हो लेकिन समाज के ज्यादातर लोग तो अब भी नये ब्रिटिश कानूनों – व्यवस्थाओं से दबकर जीने को मजबूर ही हैं। ज्यादा से ज्यादा टैक्स देने पर मजबूर किये जा रहे हैं। सूखा पड़ने के वक्त भी सरकार टैक्स में कोई रियायत नहीं देती। इससे अनाज की कमी हो जाती। सूखा का संकट अकाल के संकट में बदल जाता। अकाल…. यानी कि अभाव और अभाव वो भी अनाज का और अनाज जिसके बिना जीवन संभव नहीं ! इन सब के साथ सबसे बड़ी त्रासदी की वजह थी आदिवासियों की जमीन छीना जाना। अंग्रेजों के बनाये नये स्थानीय जमींदारों ने आदिवासियों पर कहर बरपा दिया। पहले उन्हें ऊंची दरों पर कर्ज दिए। फिर फसल हुई तो अंग्रेजी सरकार ने मनमाफिक टैक्स वसूलने का अधिकार जमींदारों को दे ही रखा था, सो इस तरह फसल का बड़ा हिस्सा टैक्स (लगान)के रूप में वसूल भी लेते थे। इसके अलावा वही जमींदार अपने दिए कर्ज की याद दिलाकर कर्ज की वसूली के रूप में आदिवासी किसानों की जमीनें भी छीन लेते थे। जीने के लिए आदिवासी किसान को अपनी ही जमीन पर बेगार मजदूर बनकर जीना पड़ता ताकि कम से कम दो वक्त पेट भर जाए।
इन सारी त्रासदियों के साथ-साथ बिरसा ने एक चीज और देखी। अंग्रेजों ने नये कानून और टैक्स लादकर समाज को आर्थिक रूप से तो हीन बना ही दिया था। लेकिन साथ ही वे यहां के धर्म और संस्कृति का भी मजाक उड़ाते थे और यहां के लोगों को जंगली कहते थे। मतलब ये कि आर्थिक रूप से भी हीन और साथ-साथ सांस्कृतिक रूप से भी हीन बना देना अंग्रेजों के दो प्रमुख हथियार थे।
बिरसा ने इन सारे पहलूओं को महीनी से देखा – समझा. जितना ही वे इन घटनाओं को समझ रहे थे उतना ही अब उनके लिए चुप बैठना मुश्किल होते जा रहा था। बेचैनी के साथ कोई भी कितने दिनों तक जी सकता है! बेचैनी को खत्म करने के दो ही तरीके होते हैं। या तो स्वीकार कर लीजिए या तो समाधान की तरफ कदम बढ़ाइए। बिरसा ने अपनी कुछ ना कर पाने की बेचैनी को खत्म करने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया और समाधान की तरफ कदम बढ़ाने शुरू कर दिए।
सबसे पहले बिरसा ने ईसाई धर्म त्याग दिया। सांस्कृतिक रूप से हीन बनने को स्वीकार करना छोड़ दिया। आदिवासियों का अपना धर्म और संस्कृति किसी से कम नहीं हैं। ये मत सबके सामने रखना शुरू किया। बिरसा अब कई आंदोलन और विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बनने लगे। यहां फिर उनकी प्रतिभा ने उन्हें ज्यादा वक्त नहीं लेने दिया। वो जल्द ही आंदोलनों को गांव गांव में पहुंचाने और भाषण देने की कला में माहिर हो गए। वो जब बोलते तो लोग ठहर जाते. बातें दिल तक उतर जातीं।
बिरसा ने लोगों से कहा कि आदिवासी किसी भी तरह से हीन नहीं हैं। बल्कि जंगल के पुत्र हैं। बिरसा ने समझाया कि आदिवासियों की अपनी संस्कृति है। अपना खान-पान रहन-सहन है। अपना इतिहास, अपना धर्म , अपने लोकगीत, अपनी लोककथाएं हैं। आदिवासी किसी से पीछे नहीं हैं। उनका भी उतना ही सम्मान है जितना दूसरों का। इसलिए उन्हें अपनी आदिवासी संस्कृति को छोड़कर किसी दूसरे धर्म – संस्कृति में अपना कल्याण देखने की जरूरत नहीं है।
बिरसा सिर्फ धर्म परिवर्तन की आलोचना तक सीमित नहीं थे। बल्कि बिरसा ने अपनी नयी धार्मिक व्याख्या भी पेश की। वो कहते थे, “अगर हमें बाहर के दुश्मनों से लड़ना है तो पहले अपने अंदर के दुश्मन यानी अपनी बुराइयों को हराना होगा”।
बिरसा ने आदिवासी समाज में फैले नशे की लत, आपसी लड़ाई झगड़े और अशिक्षा जैसे मुद्दों को अपने अंदर की बुराई बताया और इन बुराइयों को हराने का महत्व आम लोगों को समझाया. उन्होंने आम लोगों के बीच ज़ोर दिया कि बिना अपने अंदर की बुराइयों को हराये बाहर के दुश्मनों को नहीं हराया जा सकता।
बिरसा इस कोशिश में आदिवासी समाज में समाज सुधार की दुर्लभ परिघटना दिखाई देती है। और सिर्फ आदिवासी समाज ही क्यों, पूरे भारत में भी देखें तो गांधी के पहले बहुत ही कम ऐसे लोकप्रिय नेतृत्वकर्ता हुए थे जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ने के लिए सिर्फ हथियार को ही सब कुछ नहीं समझ लिया। बल्कि समाज सुधार और जागरूकता को अहम साधन के रूप में पहचाना और उसपर गंभीरता से कोशिश की। ये अप्रोच पूरे भारत में भी देखें तो दुर्लभ ही थी। गांधी के आने के बाद ही इस अप्रोच को मुख्यधारा के नेतृत्वकर्ताओं ने प्रमुखता दी। जबकि बिरसा उन बिरले लोगों में से थे जिन्होंने अंग्रेजों से आजाद होने में समाज सुधार के महत्व को पहचाना था।
बिरसा ने अपने समाज सुधार के संदेश को मजबूत बनाने के लिए एक काम और किया। खुद को ईश्वर के दूत के रूप में पेश किया। शायद जीसस की कहानियों से उन्हें इस तरीके को इस्तेमाल करने की प्रेरणा मिली हो। जीसस की ही तरह वो लोगों के बीच ईश्वर के दूत की तरह जाते और समाज सुधार के संदेश फैलाते। बिमार लोगों का इलाज भी करते। अब लोग दूर दूर से उनके पास आने लगे।
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‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा (‘Dharti Abba’)
गरीबी और हीनता की चोट खाये बिमार मन और भूख से लड़ते बिमार तन… दोनों तरह की परेशानी झेलते आदिवासी दूर दूर से उनके पास पहुंचने लगे थे। वो मन और तन दोनों तरह के कष्ट का समाधान बताते बिरसा को श्रद्धावश ‘धरती आबा’ कहकर पुकारने लगे। बिरसा मुंडा अब ‘धरती आबा’ हो चुके थे।
बिरसा मुंडा का यश कितनी दूर दूर तक फैला था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि झारखंड, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश तक के आदिवासी समाजों में बिरसा की याद में बने लोकगीत और लोककथाएं आज भी पर्व-त्यौहारों के वक्त सुने-सुनाये जाते हैं।
बिरसा का एक नारा था, “अबुआ राज स्ते आना – महारानी राज तुंडु जाना ”
बिरसा अब प्रभावशाली हो चुके थे. अब उन्होंने सरकार के बढ़ाये टैक्स और महंगाई में पिस रही जनता की तरफ से हमलावर होना शुरू कर दिया। उनका एक नारा था, “अबुआ राज स्ते आना – महारानी राज तुंडु जाना ” । इस नारे को हिंदी में कुछ इस तरह कह सकते हैं, ” अपना राज आएगा – महाराना राज जाएगा ” इस नारे की गूंज बंगाल से लेकर मध्यप्रदेश तक और बिहार से लेकर उड़ीसा तक के आदिवासी समाज में सुनाई देती थी। उन्होंने आम लोगों को सरकारी अधिकारियों के पास कर(टैक्स) जमा करने से भी मना कर दिया।
इस बीच अचानक एक अफवाह फैल गई कि जो बिरसा की अपील को नहीं मानेगा और सरकारी अधिकारियों के पास टैक्स जमा करेगा उसे जान से हाथ धोना पड़ेगा। इस बात के लिए बिरसा को दोषी माना गया और जेल भेज दिया गया। कुछ डेढ़ दो साल की सजा के बाद 1898 में जेल से बाहर आकर बिरसा ने आज के झारखंड की राजधानी रांची के चुटिया नाम की जगह में, जो आज रांची शहर का ही हिस्सा हो चुका है, एक मंदिर पर अपना अधिकार कर लिया। मंदिर पर अधिकार करने का मतलब था अंग्रेजी सरकार के मातहत आदिवासी किसानों और खेतीहरों से लगान वसूलने वाले हिंदू जमींदारों के आधिपत्य को चुनौती देना। बिरसा अब हिंदू जमींदारों, ईसाई मिशनरियों और अंग्रेज सरकार तीनों प्रभावशाली वर्गों की आंखों में खटकने लगे थे। पुलिस उनकी तलाश में रहने लगी और बिरसा हर बार चकमा देकर वहां से भागने में कामयाब रहते और नये नये ठिकानों में विद्रोह की रणनीतियां बनाते। इसी दौर में , कहा जाता है कि वे रांची के धुर्वा स्थित जगन्नाथ मंदिर भी गए थे।
इसी तरह वो 1899 का साल भी आ गया जब 7000 आदिवासी पुरुष और स्त्रियां एक जगह जमा हुए। इन लोगों ने इसके लिए क्रिसमस का दिन चुना था। क्योंकि ईसाई अंग्रेज अधिकारी इस दिन चर्च के पास इकट्ठा होते और इसी दौरान उन्हें हमले का शिकार बनाया जाना था।
जल्द ही खूंटी ,तमाड़, बसिया और रांची में ऐसे और भी हुजूम इकट्ठा होने लगे। बिरसा ने इस बीच ये साफ कर दिया कि उनके निशाने पर केवल अंग्रेज अधिकारी ही रहेंगे। वो आदिवासी जो किसी भी स्थितिवश अब ईसाई बन चुके थे, उन्हें हमले का शिकार नहीं बनाया जाएगा क्योंकि असली दुश्मन अंग्रेज सरकार थी ना कि ईसाई बन चुके आदिवासी।
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बिरसा के अनुयायियों ने इस विद्रोह में कई जगह सरकारी इमारतों को ध्वस्त कर दिया। कुछ पुलिस कर्मचारियों के मरने की भी खबर आई। इस विकट परिस्थिति से निपटने के लिए कमिश्नर और डिप्टी कमिश्नर हथियारबंद सिपाहियों के साथ विद्रोह को कुचलने निकल पड़े। बिरसा मुंडा को पकड़ने या अड्डे का पता बताने पर 500 रूपये का ईनाम घोषित कर दिया गया।
इसी पुलिसिया सर्च अभियान के तहत आज के पश्चिमी सिंहभूम (मुख्यालय जमशेदपुर) के डुंबरी पहाड़ में अंधाधुंध गोलीबारी की गई जिसमें सैंकड़ों आदिवासी पुरूषों स्त्रियों के मारे जाने की बात कही जाती है। इस गोलीबारी से बचकर निकलने में बिरसा फिर कामयाब रहे।
बिरसा कैसे पकड़े गए…
बिरसा कैसे पकड़े गए। इसकी कई कहानियां हैं। कुछ के अनुसार वे छुपे हुए थे और अचानक पुलिस ने उन्हें घेर लिया था। कुछ कहानियों के अनुसार बिरसा बिमार थे और इलाज की जगह पर और पुलिस ने घेरा डाल कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। वहीं एक कहानी के अनुसार बिरसा अपने अड्डे पर थे। किसी ने उन्हें सूचना दी कि पास के गांव में एक आदमी बहुत ज्यादा बिमार है। वक्त पर इलाज ना मिला तो जान जा सकती है। बिरसा के सहयोगियों ने बिरसा को समझाया कि अड्डे से बाहर जाना खतरे से खाली नहीं है। सशस्त्र विद्रोह के बाद अंग्रेजी पुलिस उन्हें हर जगह तलाश रही है। लेकिन बिरसा ने उस बिमार आदमी का इलाज करने के लिए अड्डे से बाहर निकलना ही चुना। वो उस पहाड़ी में बनाई हुई झोंपड़ी के अंदर उस बिमार आदमी का इलाज करने लगे. काढ़ा तैयार करने लगे। इसी बीच किसी ने जाकर पुलिस को सूचना दे दी कि बिरसा इधर ही हैं। और कुछ ही देर में पुलिस ने चारों तरफ से बिरसा को घेर लिया. बिरसा गिरफ्तार हो गए। उन्हें रांची के आज के सबसे व्यस्त फिरायालाल चौक से दक्षिणी दिशा में कोई एक किमी दूर जेल में रखा गया था। बाद में 9 जून 1890 को जेल में ही बिरसा की मृत्यु हो गई।
वो जेल आज भी है। उस जेल के पास बने चौक को आज भी जेल मोड़ के नाम से जाना जाता है। वैसे तब रांची शहर नहीं था। फिरायालाल चौक भी नहीं था। सिर्फ पगडंडियां थीं। जंगल था। गांव था। कहते हैं जिस जंगल में बिरसा छुपे थे वो चक्रधरपुर का जमकोपई जंगल था।
…तो कहानी जंगल में जन्मे आदमी की थी। जंगल में ही वो जन्मा था। जंगल में ही पला बढ़ा। जंगल के खुलेपन से, ताजी हवा से, आजादी से और जंगल में रहने वालों से उसने प्यार किया। खूब प्यार किया। जान जोखिम में डाल कर प्यार किया। बदले में जंगल में रहने वालों से भी उसे ढेर सारा प्यार मिला। लेकिन धोखा भी जंगल में ही किसी अपने से मिला और मिट्टी से बना शरीर मिट्टी में इसी जंगल में मिल गया…. जंगल के ही नाम। रह गया बिरसा मुंडा का नाम। धरती आबा की जलाई वो आजादी की लौ और अपने अंदर की बुराइयों को हराने का संदेश।
वो लोग जो सिर्फ अपनी लाइफ बेहतर बनाने तक सीमित रहते हैं। उनमें से कई लोग शायद ये कहेंगे कि बिरसा और उनके साथियों के संघर्ष से दुख तकलीफ और जेल की सजा के अलावा क्या मिला? उनके लिए जवाब ये है कि आजादी का संघर्ष अपने आप में एक अद्भुत घटना होती है जो हार या जीत से नहीं तौली जाती। वैसे इस संघर्ष का असर कहें या अंग्रेजी सरकार की समझदारी….. कि उन्होंने आठ साल बाद छोटा नागपुर टेनेन्सी ऐक्ट पास किया। जिसके तहत आदिवासियों से कोई गैर आदिवासी अब जमीन नहीं छीन सकता था। ले भी नहीं सकता था।
आज इस कानून की क्या जरूरत है या नहीं। ये अलग बातचीत का विषय है। लेकिन उस वक्त ये कानून आदिवासियों को बेघर होने से बचाने के लिए कम से कम कागज पर आदिवासियों का पक्ष मजबूत कर गया।